झारखंड प्रांत के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने गत 23 नवंबर को नारायणपुर प्रखंड के बोरवा पंचायत में आयोजित एक कार्यक्रम में एस आई आर के खिलाफ वक्तव्य देकर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर देना कितना न्याय संगत है ? विचारणीय यह है कि वे एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। वे इसी संवैधानिक चुनाव प्रणाली के तहत चुनाव जीतकर विधानसभा के सदस्य बने। उसके बाद झारखंड प्रांत के कैबिनेट मंत्री बने। अब सवाल यह उठता है कि उन्हें चुनाव आयोग को एस आई आर के मुद्दे पर कटघरे में खड़ा करना चाहिए ? इस बात की राजनीतिक गलियारे में बड़े ही जोर-शोर से चर्चा हो रही है कि क्या एक मंत्री को चुनाव आयोग के खिलाफ ऐसा विवादित बयान देना चाहिए ? पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं होती रहती हैं। किंतु संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ किसी को भी बोलने की आजादी नहीं है। अगर उन्हें चुनाव आयोग के क्रिया कलाप पर कोई आपत्ति थी, तो एस आई आर के खिलाफ सीधे न्यायालय में अपनी बात दर्ज कर सकते थे। लेकिन उन्होंने एक सार्वजनिक मंच से चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर एक तरह से संवैधानिक मूल्यों को कुचलने जैसा कार्य किया है।
उन्होंने उक्त मंच से कहा कि ‘एस आई आर के नाम पर कई राज्यों में वोटरों के नाम बड़ी संख्या में काटे गए हैं। और झारखंड में भी इसी तरह की साजिश हो सकती है ।’ अब सवाल यह उठता है कि इरफान अंसारी के पास कोई ठोस प्रमाण है कि किस राज्य के वोटरों के नाम काटे गए हैं ? अगर उनके पास कोई प्रमाण है, तो उच्चतम न्यायालय में चुनाव आयोग के खिलाफ मामला क्यों नहीं दर्ज कर देते हैं ? सर्वविदित है कि चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए एस आई आर करने का निर्णय लिया । पहले देशवासियों को मतदान करने का अधिकार 21 वर्ष के उम्र के लोगों को था। बाद में संशोधन कर इसे 18 वर्ष किया गया। जिस कारण कई मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई। अगर हम सब चुनाव में निष्पक्षता और पारदर्शिता चाहते हैं, तो मतदाता सूची बिल्कुल पारदर्शी होनी चाहिए। तभी देश में निष्पक्ष चुनाव संपन्न हो सकता है। साथ ही किसी भी स्थिति में देश के एक भी मतदाता को उसके मतदान के अधिकार से वंचित न होना चाहिए । इसलिए हर मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में अंकित होना चाहिए।
आगे डॉ इरफान अंसारी ने कहा कि बिहार में चुनाव से पहले एस आई आर के बहाने 65 लाख वोटरों के नाम काट दिए गए। इससे 80 विधानसभा सीटों पर सीधा असर पड़ा।’ उन्होंने यह कह कर चुनाव आयोग पर बहुत ही बड़ा गंभीर आरोप लगाया है । चुनाव आयोग ने यह हर संभव प्रयास किया कि बिहार के मतदाता सूची पूरी तरह पारदर्शी बने। इसलिए नियमानुसार अनावश्यक नामो को मतदाता सूची से हटाया गया । इसके साथ ही काफी संख्या में नए मतदाताओं का नाम भी जोड़ा गया। यह सारी कार्रवाई बिहार मतदाता पोर्टल पर उपलब्ध है। जो मतदाता मर गए, उन सबों का नाम मतदाता सूची में रहना कदापि उचित नहीं है। एस आई आर ने मृत मतदाताओं को मतदाता सूची से नाम हटाकर इसे और भी बेहतर बनाया है। बिहार प्रांत में एस आई आर का कार्य चुनाव आयोग ने पूरे शांतिप्रिय माहौल में संपन्न करवाया। चुनाव आयोग की प्रशंसा होनी चाहिए न कि उस पर झूठा आरोप लगाया जाना चाहिए। बिहार विधानसभा में हुए चुनाव परिणाम को चुनाव आयोग से जोड़कर देखना कदापि उचित नहीं है। अंसारी जी ने कहा कि 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं । उन्हें यह भी बताना चाहिए कि किन मतदाताओं के नाम हटाए गए ?
आगे इरफान अंसारी ने कहा कि ‘अब वह प्रक्रिया बंगाल में चल रही है । और इसके बाद झारखंड की बारी आने वाली है ।’ अंसारी साहब को यह जानना चाहिए कि चुनाव आयोग ने पहले चरण में नौ केंद्र शासित और अन्य राज्यों में एस आई आर करने का निर्णय लिया है। चुनाव आयोग की पहली एस आई आर सूची में झारखंड का नाम ही नहीं है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार एस आई आर का विरोध क्यों कर रही है ? यह बात अब किसी से छुपी हुई नहीं है। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी के घुसपैठियों की बात जग जाहिर है। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिए गलत तरीके अपनाकर अपने अपने नाम मतदाता सूची में शामिल कर लिए हैं क्या यह जायज है ? क्या ऐसे घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से नहीं काटा जाना चाहिए ?
आगे उन्होंने कहा कि ‘भाजपा संगठित तरीके से वोटर लिस्ट से आपका नाम हटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि एस आई आर के माध्यम से सबसे पहले लोगों के वोटर कार्ड फिर ,आधार कार्ड और अंत में राशन कार्ड से नाम हटाने की साजिश की जा रही है, जिससे नागरिकता पर संकट पैदा हो सकता है ।’ अंसारी का यह बयान पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है। भाजपा आखिर संगठित तरीके से कैसे लोगों की नागरिकता समाप्त करने में लगी हुई है ? यह चुनाव आयोग सहित भाजपा पर अंसारी ने बड़ा गंभीर आरोप लगाया है । केंद्र में भाजपा की सरकार जनता की वोट से बैठी है, न कि चुनाव आयोग की कृपा से । चुनाव आयोग एक अलग स्वायत्त संस्था है, जिसका कार्य है, देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करना । केंद्र अथवा देशभर के राज्यों में किसकी सरकार बनती है ? इससे चुनाव आयोग को कुछ भी लेना देना नहीं है।
इरफान अंसारी यही रुकते नहीं है । आगे उन्होंने आगे कहा कि ‘अगर बीएलओ आपके घर पर एस आई आर करने आए तो उन्हें बंधक बनाकर रखिए । इसके बाद हम खुद आकर उन्हें छुड़ाएंगे ।’ एक मंत्री के रूप में उनका यह बयान पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना है। और संवैधानिक है। यह सीधे तौर पर चुनाव आयोग को मिले भारत के संवैधानिक अधिकारों को चुनौती देने के समान है। एक मंत्री सार्वजनिक मंच से यह बोल रहा हो कि एस आई आर के बीएलओ कर्मचारियों को बंधक बनाकर रखें। यह तो पूरी तरह जंगल राज की बात हो गई। क्या झारखंड में जंगल राज है ? इरफान अंसारी भी इसी निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव के बदौलत मंत्री बनें ।
आगे उन्होंने कहा कि ‘यह आपकी पहचान और अधिकार की लड़ाई है। ग्रामीणों को इस प्रक्रिया को समझने की जरूरत है। क्योंकि यह केवल कई सुधार नहीं बल्कि लोगों की लोकतांत्रिक पहचान से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। यह योजनाबद्ध तरीके से कमजोर वर्गों, अल्पसंख्यकों और गरीब तत्वों की नागरिकता और मतदान अधिकार को खत्म करने की रणनीति चल रही है।’ उन्होंने वोट की राजनीति के तहत भोले भाले ग्रामीणों के बीच गलत सूचना दी है। उन्होंने ऐसा कह कर देश की एकता और अखंडता खंडता पर भी कुठाराघात किया है।
देशवासियों को जानना चाहिए कि चुनाव आयोग ने संपूर्ण देश में विशेष गहन पुनरीक्षण, एस आई आर करने का निर्णय लिया है। इस निर्णय के तहत पूरे देश में एस आई आर होगा। चुनाव आयोग, भारत सरकार की एक स्वायत्त संस्था है, जिसकी जवाबदेही है कि संवैधानिक तरीके से देश भर में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराई जाए। चुनाव आयोग के इस कार्य में न केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारों का कोई हस्तक्षेप होता है। अगर केंद्र सरकार, केंद्र शासित प्रदेश और देश के किसी राज्य सरकार के पक्ष अथवा विपक्ष के नेताओं को कोई चुनाव से संबंधित शिकायत है, तो संवैधानिक तरीके से चुनाव आयोग को आवेदन कर सकते हैं, जिस पर चुनाव आयोग विधि सम्मत निर्णय लेता है। अगर नेताओं को चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली से शिकायत है, तो सीधे न्यायालय में अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। लोकतंत्र की मजबूती के लिए केंद्र सरकार, केंद्र शासित प्रदेशों, राज्य सरकारों, न्यायपालिका, कार्यपालिका और चुनाव आयोग के क्रिया कलाप भारत के संविधान के संवैधानिक नियमों पर आधारित है, ताकि कोई संस्था निरंकुश न हो जाए।
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