10/04/26
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भारतीय एनजीओ ‘एजुकेट गर्ल्स’ को मिला मैग्सेसे पुरस्कार

भारत की एनजीओ ‘एजुकेट गर्ल्स’ को प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे सम्मान मिला है। संस्थाय ने यह सम्मान उन हजारों क्षेत्रीय समन्वयकों, स्वयंसेवकों और युवा मार्गदर्शकों (मेंटर्स) को समर्पित किया है, जिन्होंने देश की लाखों लड़कियों को स्कूल वापस लाने में मदद की है। इस पुरस्कार की घोषणा 31 अगस्त को की गई थी। फिलीपींस के राजधानी शहर में शुक्रवार को एक औपचारिक समारोह में यह पुरस्कार प्रदान किया गया। ‘एजुकेट गर्ल्स’ की स्थापना साल 2007 में हुई। यह संस्था उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार के तीस हजार से अधिक गांवों में काम कर रही है। संस्था का मकसद गरीबी और निरक्षरता के चक्र को तोड़ना है। 55 हजार से अधिक स्वयंसेवकों की मदद से इस संस्था ने अब तक 20 लाख से अधिक लड़कियों को स्कूल वापस लाने और 24 लाख से ज्यादा बच्चों को शिक्षा कार्यक्रमों से जोड़ने में मदद की है। संस्था की संस्थापक सफीना हुसैन को पुरस्कार स्वीकार करते हुए कहा, यह पुरस्कार हमारी उन बेटियों के नाम हैं, जो अपने साहस, संघर्ष और दृढ़ता से हमें प्रेरित करती हैं। जो घर की जिम्मेदारियां संभालते हुए देर रात तक पढ़ाई करती हैं, ताकि अपने और अपने परिवार का भविष्य बेहतर बना सकें। यह सम्मान उन माता-पिताओं, शिक्षकों, समुदाय के सदस्यों और 55 हजार स्वयंसेवकों के नाम है, जो हर दिन इन बेटियों के साथ खड़े रहते हैं। एनजीओ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) गायत्री नायर लोबो ने कहा कि यह सम्मान इस बात की याद दिलाता है कि जब लोग एकजुट होकर किसी मकसद के लिए काम करते हैं, तो असंभव को भी संभव बना सकते हैं। उन्होंने कहा, यह पुरस्कार हमारे सामूहिक प्रयासों, नवोन्मेषी कार्यक्रमों और सरकारी पहलों की पहचान है। अब हमारा लक्ष्य 2035 तक एक करोड़ शिक्षार्थियों तक पहुंचने का है। दुनियाभर में अभी भी लाखों लड़कियां शिक्षा के अवसर का इंतजार कर रही हैं और हम नहीं चाहते कि उन्हें अब और इंतजार करना पड़े। पुरस्कार प्रदान करते हुए रेमन मैग्ससे अवॉर्ड फाउंडेशन ने एजुकेट गर्ल्स के ‘लड़कियों और युवतियों की शिक्षा के जरिये सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को तोड़ने, उन्हें निरक्षरता की बेड़ियों से मुक्त करने और उनके भीतर कौशल, साहस और आत्मनिर्भरता का विकास करने के समर्पण’ की सराहना की। संस्था की 25 सदस्यीय टीम पुरस्कार समारोह में शामिल होने के लिए मनीला पहुंची, जिसमें क्षेत्रीय समन्वयक, स्वयंसेवक और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी शामिल थे। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार को एशिया का ‘नोबेल पुरस्कार’ भी कहा जाता है।

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