1990 के दशक में फिलीपींस में पेप्सी की नंबर फीवर स्कीम ने करोड़ों लोगों को अमीर बनने का सपना दिखाया, लेकिन एक मानवीय गलती ने इसे इतिहास की सबसे बड़ी मार्केटिंग त्रासदी बना दिया. फिलीपींस में पेप्सी और कोका-कोला के बीच जबरदस्त ‘कोला वॉर’ चल रही थी. इसी दौड़ में आगे निकलने के लिए पेप्सी ने शुरू किया था एक स्कीम- Number Fever (नंबर फीवर). इस स्कीम में हर बोतल के ढक्कन पर एक नंबर होता था. अगर वो नंबर टीवी पर घोषित नंबर से मैच कर जाए, तो विजेता को मिलते थे 10 लाख पेसो (करीब 54 लाख रुपये).
गरीबी झेल रहे फिलीपींस के लाखों लोगों के लिए यह उम्मीद की किरण बन गई. लोग बोतलें खरीद-खरीदकर नंबर ढूंढने लगे. देखते ही देखते पूरा देश इस ‘नंबर फीवर’ में डूब गया. लेकिन मई 1992 की एक शाम सब कुछ बदल गया. टीवी पर विजेता नंबर घोषित हुआ 349. हजारों लोगों के पास वही नंबर निकला. लोग खुशी से झूम उठे, जश्न मनाने लगे. पर जल्द ही पता चला कि यह एक भयानक गलती थी. असल में 349 नंबर को कभी विजेता बनना ही नहीं था. यह नंबर गलती से 6 लाख से ज्यादा बोतल ढक्कनों पर छप गया था. जब लोगों ने अपना इनाम लेने के लिए पेप्सी के दफ्तरों का रुख किया, तो कंपनी ने माफी मांगते हुए सिर्फ 500 पेसो (करीब 1,800 रुपये) देने की पेशकश की. इससे लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. दंगे भड़क उठे, पेप्सी ट्रकों पर हमले हुए और कम से कम 5 लोगों की मौत हो गई.
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